सांख्यिकीय शून्य

दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे संगठित धोखाधड़ी का नाम जानते हैं? उसे ‘सार्वजनिक सहमति’ (Public Consensus) कहते हैं। यह शब्द सुनते ही कानों में ऐसा रस घुलता है जैसे कोई पवित्र गंगा जल छिड़क रहा हो, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर यह किसी पुराने रेलवे स्टेशन पर मिलने वाली उस ‘मसाला चाय’ की तरह है, जिसमें पानी ज़्यादा, चीनी की जगह सैक्रीन और अदरक का सिर्फ मनोवैज्ञानिक वहम होता है। या यूँ कहें कि यह उस फीकी ‘खिचड़ी’ की तरह है जिसे अस्पतालों में मरणासन्न मरीजों को खिलाया जाता है ताकि वे बिना शोर मचाए चुपचाप मर सकें। लोग घंटों वातानुकूलित कमरों में, पसीने की दबी हुई बदबू और सड़ी हुई इंस्टेंट कॉफी के बीच अपना गला फाड़ते हैं, यह सोचकर कि वे समाज या संगठन के लिए कोई युगांतकारी निर्णय ले रहे हैं। लेकिन अगर हम इस शोर-शराबे को ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के निर्मम चश्मे से देखें, तो यह केवल एक सांख्यिकीय तमाशा है, जो एक खराब तरीके से बनाए गए राशन कार्ड की लाइन में खड़े होने जैसा थकाऊ और अपमानजनक है। हम इसे लोकतंत्र कहते हैं, मैं इसे एंट्रॉपी का धीमा ज़हर कहता हूँ।

कोलाहल

किसी भी कॉरपोरेट बोर्ड मीटिंग या सरकारी पंचायत का दृश्य देखिए। वहाँ बैठे लोग अपनी ‘भावनाओं’, ‘अनुभवों’ और ‘गट फीलिंग’ का रोना रोते हैं, जैसे कोई अधेड़ उम्र का आदमी अपनी पुरानी कब्ज की समस्या का बखान कर रहा हो। तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) की दृष्टि से, वे और कुछ नहीं कर रहे, बस अपने प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में जमा हुए कचरे को शब्दों में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। यह शोर वैसा ही है जैसे ट्रैफिक जाम में बिना वजह बजने वाला हॉर्न—बेमतलब, तीखा और सिरदर्द पैदा करने वाला। जब दस लोग एक कमरे में बैठकर ‘सहमति’ बनाने की कोशिश करते हैं, तो वे समस्या का समाधान नहीं खोज रहे होते, बल्कि वे एक-दूसरे के अहंकार को सहलाने का एक सामाजिक अनुष्ठान कर रहे होते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा और भद्दा मजाक वह बुनियादी ढांचा है जो इन तथाकथित ‘विचारकों’ को सहारा देता है। ये लोग एक शानदार एर्गोनोमिक कुर्सी पर अपनी भारी-भरकम और सुस्त देह टिकाकर बैठते हैं, यह भूलकर कि चाहे कुर्सी कितनी भी महंगी और वैज्ञानिक रूप से डिज़ाइन की गई हो, उनके निर्णय उतने ही खोखले हैं जितनी कि उनकी रीढ़ की हड्डी। ऐसी कुर्सी पर बैठकर अपनी लम्बर स्पाइन (Lumbar Spine) को आराम देना और साथ ही तर्कों की रीढ़ तोड़ना—यही आधुनिक प्रबंधन का सार है। यह महंगी गद्दी केवल उनके उस भ्रम को पालती है कि उनके बैठने का एलीट तरीका उनके विचारों की गुणवत्ता को बदल देगा। क्या फायदा ऐसी इंजीनियरिंग का जो आपके नितंबों को तो सहारा देती है, लेकिन आपके गिरते हुए बौद्धिक स्तर को नहीं? अंततः वे उस स्मार्टफोन की बैटरी की तरह हैं जो 1% पर है, लेकिन स्क्रीन की ब्राइटनेस कम करने को तैयार नहीं।
क्या बकवास है।

वक्रता

यहाँ ‘सूचना ज्यामिति’ का प्रवेश होता है, जो असल में आम आदमी की जेब कटने की प्रक्रिया की एक जटिल गणितीय व्याख्या है। अगर हम सभी संभावित निर्णयों को एक सांख्यिकीय मैनिफोल्ड (Statistical Manifold) के रूप में देखें, तो ‘सहमति’ का मतलब है उस स्थान पर पहुँचना जहाँ ‘फिशर सूचना’ (Fisher Information) का घनत्व सबसे अधिक हो। लेकिन असल जिंदगी की खुरदुरी जमीन पर, यह उस मोड़ की तरह है जहाँ सड़क इतनी संकरी और कीचड़ भरी हो जाती है कि सबको एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर निकलना पड़ता है। इस मैनिफोल्ड की ‘वक्रता’ (Curvature) ही यह तय करती है कि चर्चा कितनी घटिया और उबाऊ होगी।

अगर विचारों के बीच की दूरी (Kullback-Leibler Divergence) बहुत ज़्यादा है, तो आप मीटिंग रूम में चाहे कितनी भी महँगी, कड़वी और ‘आर्टिसनल’ कॉफी पी लें, आप कभी भी एक स्थिर बिंदु पर नहीं पहुँचेंगे। सूचना ज्यामिति हमें चिल्ला-चिल्ला कर बताती है कि जिसे हम ‘जनहित’ या ‘कॉरपोरेट एथिक्स’ कहते हैं, वह वास्तव में इस मैनिफोल्ड पर एक स्थानीय न्यूनतम (Local Minima) के अलावा और कुछ नहीं है—वही जानलेवा गड्ढा जो बारिश के बाद आपकी गली के बाहर बन जाता है और जिसमें गिरना आपकी नियति है। जब कोई नेता या सीईओ माइक पकड़कर कहता है कि “हमें सबको साथ लेकर चलना है,” तो वह अनजाने में रीमैनियन मेट्रिक (Riemannian Metric) की बात कर रहा होता है। वह उस वक्रता को कम करने की कोशिश कर रहा है जो उसके अपने स्वार्थ और जनता की अज्ञानता के बीच मौजूद है। यह पूरी प्रक्रिया किसी सड़क किनारे के ठेले पर खड़े होकर ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने जैसी है—हाथ में अखबार में लिपटा तेल लगा ठंडा समोसा है और मुँह में भारी-भरकम शब्द। पागलपन है।

रिक्तता

अंत में, जब सब कुछ शांत हो जाता है, तो क्या बचता है? जब ‘फिशर सूचना’ का गहन विश्लेषण किया जाता है, तो यह कड़वा सच सामने आता है कि तथाकथित ‘सर्वश्रेष्ठ निर्णय’ केवल वह होता है जिसमें सबसे कम जानकारी होती है। सहमति का मतलब है सूचना की सामूहिक हत्या। जितना अधिक हम एक बिंदु पर सहमत होते हैं, उतनी ही उस निर्णय की जान निकल जाती है, उसका प्राणतत्व सूख जाता है। यह वैसा ही है जैसे आप एक कीमती फाउंटेन पेन से किसी ऐसे दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करें जिसका कोई वजूद ही न हो, जिसका कोई कानूनी या नैतिक अर्थ ही न हो। कलम की सोने की निब, उसका वजन और उसकी स्याही की गहराई उस खालीपन को नहीं ढक सकती जो उस कागज़ के पीछे छिपा है।

हम केवल सांख्यिकीय रिक्तता को सजाने के लिए महंगे औजारों और भारी-भरकम शब्दावली का सहारा लेते हैं। थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम अटल है: एन्ट्रापी और कचरा हमेशा बढ़ेगा। हम अंतहीन बैठकों और पॉवरपॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से उस कचरे को केवल एक नया, फैंसी नाम देने का नाटक करते हैं। हम उस ऊर्जा को नष्ट कर रहे हैं जो शायद चुप रहने में बेहतर इस्तेमाल हो सकती थी।
घर जाना है।
सहमति कोई उपलब्धि नहीं है; यह उन लोगों का थका हुआ आत्मसमर्पण है जो अब और बहस करने की मानसिक और शारीरिक ऊर्जा खो चुके हैं। अगली बार जब आप किसी ‘सार्वजनिक निर्णय’ का हिस्सा बनें, तो याद रखिएगा कि आप किसी महान उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर रहे, बल्कि आप केवल एक सांख्यिकीय वक्र पर एक तुच्छ, मटमैले बिंदु हैं, जो धीरे-धीरे और अनिवार्य रूप से शून्य की ओर खिसक रहा है।

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