सांख्यिकीय प्रपंच

गर्मियों की उमस भरी दोपहर में लुटियंस दिल्ली का एक सरकारी कमरा। पुरानी फाइलों की सड़ांध, दीवारों पर सीलन के नक्शे, और एयर कंडीशनर से आती फफूंद (mold) की वही चिर-परिचित गंध। मेज के चारों ओर बैठे ये तथाकथित ‘गणमान्य’ व्यक्ति, जिनके मुंह से बासी समोसे और सस्ती इलायची की मिली-जुली बदबू आ रही है, ‘राष्ट्र निर्माण’ का ढोंग कर रहे हैं। जिसे दुनिया ‘सार्वजनिक निर्णय’ (Public Decision-making) कहती है, वह वास्तव में एक उच्च-स्तरीय जैविक कचरा प्रबंधन की प्रक्रिया है। हम यहाँ ‘समाज’ बनाने नहीं, बल्कि अपनी-अपनी असुरक्षाओं का सौदा करने आए हैं। यह कोई पवित्र ‘सामाजिक अनुबंध’ (Social Contract) नहीं है; यह बासी रोटी के आखिरी टुकड़े के लिए गली के कुत्तों की मूक लड़ाई है, बस फर्क इतना है कि हमने रेशमी टाई और स्टार्च वाले कुर्ते पहने हुए हैं।

ज्यामिति का नरक

एक आम आदमी जिसे ‘संसदीय बहस’ या ‘बोर्डरूम मीटिंग’ समझता है, वह गणितीय दृष्टि से एक ‘सांख्यिकीय मैनिफोल्ड’ (Statistical Manifold) पर रेंगने वाले कीड़ों की बेतरतीब हरकत मात्र है। कृपया प्रो. अमारी की ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) की सुंदरता को भूल जाइए—असली ज्यामिति वह है जो आपकी रीढ़ की हड्डी में तब बनती है जब आप महीने की 25 तारीख को अपना बैंक बैलेंस देखते हैं और धड़कन रुकने लगती है। यहाँ दो विचारों के बीच की दूरी तर्कों या नैतिकता से नहीं, बल्कि एक क्रूर ‘रीमानियन मेट्रिक’ (Riemannian Metric) से मापी जाती है। यह मेट्रिक क्या मापता है? यह मापता है कि दूसरे व्यक्ति के अहंकार को कुचलकर उसे अपनी बात मनवाने में कितनी ‘ऊर्जा’—यानी कितना झूठ और कितना प्रपंच—खर्च होगा।

आप जिसे ‘सहमति’ या ‘सर्वसम्मति’ कहते हैं, वह ज्यामिति की भाषा में एक ‘जियोडेसिक’ (Geodesic)—यानी दो बिंदुओं के बीच का सबसे छोटा रास्ता—होना चाहिए था। लेकिन भारतीय संदर्भ में, यह जियोडेसिक सीधी रेखा नहीं है। यह शाम के 6 बजे राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर भीड़ को कोहनियों से कुचलते हुए निकलने जैसा है। आप यह नहीं देखते कि आपने कितनों के पैरों को रौंदा या कितनों की सांसें रोकीं; आप बस दरवाजे तक पहुँचना चाहते हैं। समाज का हर ‘समझौता’ दरअसल एक हिंसक कृत्य है। ‘फिशर इंफॉर्मेशन मैट्रिक्स’ (Fisher Information Matrix) उस तनाव को मापता है जो एक सामूहिक झूठ को सच मानने में खर्च होता है। हम सब अपनी-अपनी संभावनाओं के वितरण (Probability Distributions) में कैद हैं, और जब हम ‘एकीकरण’ की बात करते हैं, तो हम असल में एक-दूसरे के शोर को निगलने की कोशिश कर रहे होते हैं। यह ज्यामिति सुंदर नहीं है; यह खून, पसीने और ‘जुगाड़’ की ग्रीस से सनी हुई है। इस स्पेस की वक्रता (Curvature) इतनी नकारात्मक है कि यहाँ सीधा चलना असंभव है। यहाँ हर कोई टेढ़ा है, और जो सीधा है, वह केवल एक सांख्यिकीय त्रुटि (Statistical Outlier) है जिसे सिस्टम बाहर फेंक देता है।

शून्य का व्यापार

और इस पूरे घिनौने तमाशे को वैधता देने के लिए हमें प्रॉप्स (Props) चाहिए होते हैं। ध्यान से देखिये उस संयुक्त सचिव या सीईओ को। वह अपनी मेज पर असली इतालवी लेदर से मढ़े हुए उस बेतुके महंगे प्लानर को ऐसे पटकता है, जैसे कि एक मरे हुए जानवर की खाल उसके खोखले शब्दों में जान डाल देगी। उसमें लिखा कुछ नहीं जाएगा, सिवाय इसके कि अगली मीटिंग कब है। वह लाख रुपये के उस भारी-भरकम फाउंटेन पेन की निब को कागज पर रगड़ता है, यह दिखाए बिना कि उसकी उंगलियां कांप रही हैं। स्याही शाही हो सकती है, लेकिन इरादे बिल्कुल भिखारी वाले हैं। हम वस्तुओं के पीछे छिपते हैं क्योंकि हमारे विचार नग्न हैं।

अंत में, यह सब थर्मोडायनामिक्स का एक क्रूर खेल है। हम केवल ब्रह्मांड की एन्ट्रापी (Entropy) बढ़ा रहे हैं। जितनी लंबी मीटिंग, उतनी ज्यादा गर्मी, और उतना ही कम अर्थ। जिसे आप ‘प्रगति’ कहते हैं, वह दरअसल ‘हीट डेथ’ (Heat Death) की ओर एक और कदम है। कोई निर्णय नहीं लिया गया। कोई बदलाव नहीं आया। केवल शोर बढ़ा। और आप, जो यह पढ़ रहे हैं, यह मत सोचिए कि आप इससे अलग हैं। यह लेख भी उसी शोर का एक हिस्सा है। एक और सांख्यिकीय विचलन। स्क्रीन बंद करो। अंधेरा ही एकमात्र सत्य है।

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