ऊष्मप्रवैगिकी और एन्ट्रापी का निरर्थक शोर
श्रम (Labor) वास्तव में ‘अर्थ’ (meaning) को ‘जीवित रहने के लिए कैलोरी’ में बदलने की प्रक्रिया में पैदा होने वाली, कभी न खत्म होने वाली घर्षण ऊष्मा (friction heat) के अलावा कुछ नहीं है। जब सूट-बूट पहने मैनेजमेंट गुरु ‘कार्यकुशलता’ (Efficiency) की बात करते हैं, तो वे दरअसल रीमानियन मैनिफोल्ड (Riemannian Manifold) की वक्रता को नजरअंदाज करने वाले बौद्धिक आलस्य का प्रदर्शन कर रहे होते हैं। हम जिस चीज का सामना कर रहे हैं, वह सूचना ज्यामिति (Information Geometry) की एक विकृति है—और यह उतना ही कष्टदायक है जितना कि कंकड़-पत्थर भरे रास्ते पर सस्ती चप्पल पहनकर मीलों चलना।
ज्यामितीय शोषण का मैनिफोल्ड
दफ्तर का यह वातानुकूलित माहौल यूक्लिडियन ज्यामिति (Euclidean geometry) की तरह सीधा-सपाट नहीं है, जैसा कि यह ब्लूप्रिंट पर दिखता है। यह मानवीय स्वार्थ, अहंकार और भय से मुड़ा हुआ एक विकृत स्थान है। जब आप अपनी डेस्क पर बैठकर नीली रोशनी में अपनी रेटिना को जला रहे होते हैं, तो आप फिशर सूचना मैट्रिक्स (Fisher Information Matrix) के केवल एक सांख्यिकीय बिंदु बनकर रह जाते हैं, जिसे कभी भी मिटाया जा सकता है। इस ‘श्रम के मैनिफोल्ड’ में, सबसे छोटा रास्ता (Geodesic) हमेशा मालिक की जेब की ओर जाता है, जबकि एक आम कर्मचारी उस वक्रता (Curvature) में फंसकर मेबियस स्ट्रिप (Möbius strip) की तरह गोल-गोल घूमता रहता है। यह बिल्कुल वैसा ही अनुभव है जैसा दोपहर के खाने के समय लंबी लाइन में लगकर, पसीने से तर-बतर होकर एक बासी, बेस्वाद ‘हेल्दी’ लंच बॉक्स के लिए अपनी गाढ़ी कमाई के 500 रुपये चुकाते समय होता है—पूर्णतः ज्यामितीय शून्यता और पेट में गैस का अहसास।
इस विकृति को सुधारने की कोई भी कोशिश, जैसे कि ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ या ‘टीम बॉन्डिंग’, टूटे हुए स्मार्टफोन की स्क्रीन पर सेलोटेप चिपकाने जैसी भद्दी और अस्थायी है। कर्मचारी जिसे ‘वैल्यू एडिशन’ कहते हैं, वह सिस्टम से लीक हो रही एन्ट्रापी का कचरा मात्र है। और इस कचरे को ‘उपलब्धि’ का नाम देकर हम अगले महीने के मकान किराए का इंतजाम करते हैं। जो लोग इस प्रक्रिया को अनुकूलित (optimize) करने की कोशिश में अपनी जवानी खपा देते हैं, वे अक्सर अपनी रीढ़ की हड्डी की अपरिहार्य हार को छुपाने के लिए अजीबोगरीब रूप से महंगी एर्गोनोमिक कुर्सियों का सहारा लेते हैं। वे लाखों रुपये सिर्फ इसलिए खर्च करते हैं ताकि आठ घंटे लगातार ‘बैठने’ के भौतिक दर्द को कम कर सकें और खुद को यह भुला सकें कि वे वास्तव में एक विशाल मशीन के केवल एक बदले जाने योग्य पुर्जे हैं। यह दृश्य अत्यंत दयनीय है; यह एक टूटे हुए खिलौने को सोने के धागे से सीने जैसा है।
भाषा का खेल और सड़न
संगठन का पुनर्गठन (Restructuring) विट्गेन्स्टाइन (Wittgenstein) के ‘भाषाई खेल’ (Language Game) का सबसे भद्दा और हिंसक रूप है। मीटिंग रूम में हवा में उछाले जाने वाले शब्द—’सिनर्जी’, ‘पैराडाइम शिफ्ट’, ‘ओनरशिप’, ‘स्केलेबिलिटी’—इनका कोई वास्तविक अर्थ नहीं है। ये केवल शतरंज के मोहरे हैं जिनका उपयोग दूसरों को चुप कराने, जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने और अपनी अयोग्यता को छिपाने के लिए किया जाता है। जब कोई अधीनस्थ अपने बॉस के बेतुके आदेश पर “जी सर” कहता है, तो वह समझ का संकेत नहीं, बल्कि ‘आत्मसमर्पण का अनुष्ठान’ है। यह एक ऐसा खेल है जहाँ नियम रोज बदलते हैं, लेकिन हारने वाला हमेशा वही होता है। यदि एक शेर बोल पाता, तो भी हम उसे नहीं समझ पाते—इसलिए नहीं कि उसका व्याकरण अलग है, बल्कि इसलिए क्योंकि कॉर्पोरेट दुनिया में हमने जीवित रहने के लिए ‘झूठ’ को ही अपना एकमात्र व्याकरण बना लिया है।
इस भाषाई अराजकता में, केवल ‘पैसा’ ही एक विश्वसनीय और ईमानदार प्रतीक है। बाकी सब—जैसे कि बगल वाले क्यूबिकल से आने वाली कीबोर्ड की निरंतर खटखट—केवल शोर है, जो यह याद दिलाता है कि कोई और भी अपनी जिंदगी को टाइप करके बेच रहा है। वे लोग जो खुद को ‘बौद्धिक अभिजात वर्ग’ (Intellectual Elite) मानते हैं और अपनी कमीज की जेब में मोंटब्लैंक जैसी कीमती कलम सजाकर रणनीतिकार होने का नाटक करते हैं, वे हास्यास्पद से भी बदतर हैं। उस महंगी कलम से वे जो कुछ भी डायरी में नोट कर रहे हैं, वह अंततः यही गणित होता है कि किस तरह से किसी और की मेहनत को अपनी सफलता के रूप में पेश किया जाए। यह शुद्ध रूप से परजीवी व्यवहार है जिसे ‘लीडरशिप’ का नाम दे दिया गया है।
ऊष्मप्रवैगिकी का कब्रिस्तान
अंततः, चाहे आप इसे ‘सूचना ज्यामिति’ कहें या ‘कॉर्पोरेट रणनीति’, यह सब पेट की आग बुझाने का एक जटिल नाटक है। संगठन को चाहे जितनी बार पुनर्गठित कर लो, यह सड़ी हुई करी में नया और महंगा मसाला डालने जैसा है—स्वाद भले ही बदल जाए, पर हकीकत वही रहेगी। सूचना ज्यामिति बस हमें यह गणितीय प्रमाण देती है कि हम कितनी कुशलता से ‘ऊष्मप्रवैगिकी मृत्यु’ (Thermodynamic death) की ओर बढ़ रहे हैं। हम सूचना के सागर में तैर नहीं रहे, बल्कि निरर्थकता के कीचड़ में डूब रहे हैं, और हाथ-पैर मारने को ही ‘करियर’ समझ बैठे हैं।
भूख लगी है। लेकिन इस मैनिफोल्ड पर, जहाँ हर कोई एक-दूसरे को खाने को दौड़ रहा है, ढंग के खाने की कोई गारंटी नहीं है। सब बकवास है।

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