कॉरपोरेट ऑफिस के उस कृत्रिम वातानुकूलित सन्नाटे में, जहाँ ‘सिनर्जी’ (Synergy) और ‘मानवीय मूल्य’ जैसे शब्द किसी सस्ते और एक्सपायर हो चुके सैनिटाइज़र की तरह हवा में तैरते हैं, असली खेल गणितीय क्रूरता का है। जब आपका एचआर (HR) मैनेजर ‘डायवर्सिटी’ और ‘इनक्लूजन’ पर पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन देता है, तो उसे लगता है कि वह समाज सुधार रहा है। हकीकत में, वह एक ‘स्टैटिस्टिकल मेनीफोल्ड’ (Statistical Manifold) पर उन फटे हुए नोटों को टेप से चिपकाने की कोशिश कर रहा है जिन्हें बाज़ार ने बहुत पहले खारिज कर दिया था। जिसे हम ‘कार्य संस्कृति’ कहते हैं, वह असल में आपकी जेब में पड़े उन चंद सिक्कों की खनक है जो महीने के अंत तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देते हैं और सिर्फ क्रेडिट कार्ड डिक्लाइन होने की ‘बीप’ में बदल जाते हैं।
क्या आपने कभी सड़क किनारे उस चाट वाले को देखा है जो सड़ी हुई इमली, बासी सेव और काले पड़ चुके आलुओं के बीच ‘स्वाद का संतुलन’ बनाने का ढोंग करता है? वह कोई पाक कला नहीं है। वह ‘फिशर इंफॉर्मेशन’ (Fisher Information) का एक अनौपचारिक और वीभत्स प्रयोग है—एक हताश कोशिश उस ‘सांख्यिकीय कचरे’ को छिपाने की, जिसे वह आपको खिलाने वाला है। कॉरपोरेट जगत भी यही है—एक बड़ी सी बासी भेल-पूरी, जहाँ हर कर्मचारी एक ऐसा डेटा पॉइंट है जो दूसरे का स्वाद बिगाड़ने और सिस्टम की ‘एंट्रॉपी’ (Entropy) बढ़ाने के लिए ही वहां मौजूद है। यहाँ संवेदनशीलता का अर्थ केवल इतना है कि आपका बॉस आपकी नसों से आखिरी बूंद खून निचोड़ने के लिए कितनी सटीकता से गणना कर रहा है।
श्रम का तमाशा और सड़ा हुआ तेल
लोग अक्सर ‘पब्लिक वैल्यू’ जैसे भारी-भरकम शब्दों की जुगाली करते हैं, मानो इससे उनकी आत्मा का बोझ हल्का हो जाएगा। दार्शनिकों ने इस पर ग्रंथ लिख मारे, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह केवल एक ज्यामितीय ‘कर्वेचर’ (Curvature) है, जो आपकी रीढ़ की हड्डी के झुकने के कोण से तय होता है। जब कोई कंपनी कहती है कि वह समाज के लिए ‘वैल्यू’ क्रिएट कर रही है, तो वह असल में अपने टैक्स बचाने के लिए एक नया नकाब पहन रही होती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई पुरानी, धुंआ उगलती और तेल टपकाती ऑटोरिक्शा का ड्राइवर उस पर ‘बेटी बचाओ’ का स्टिकर लगा दे ताकि हवलदार उसका चालान न काटे। व्यवस्था वही रहती है, बस स्टिकर बदल जाता है।
हम जिसे ‘करियर ग्रोथ’ का नाम देते हैं, वह सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के हिसाब से केवल एक अंतहीन ढलान है। आप ऊपर जाने की कोशिश करते हैं, ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) पथ पर चलने का भ्रम पालते हैं, लेकिन आपके जूते घिस चुके हैं और ज़मीन पर कॉर्पोरेट राजनीति का सड़ा हुआ तेल बिखरा है। संगठन जितना विशाल होता जाता है, उसका ‘फिशर इंफॉर्मेशन मैट्रिक्स’ उतना ही बदबूदार और जटिल होता जाता है। एक छोटे से प्रमोशन या वेतन वृद्धि के लिए आपको जितनी गिड़गिड़ाहट करनी पड़ती है और जितनी निरर्थक एक्सेल शीटें भरनी पड़ती हैं, वह उस अव्यवस्था का प्रमाण है जिसे कोई भी एल्गोरिदम ठीक नहीं कर सकता। आप बस एक ऐसे प्रयोगशाला के चूहे हैं जो पहिए पर दौड़ रहा है, यह सोचते हुए कि वह मंजिल की ओर बढ़ रहा है, जबकि वह सिर्फ घर्षण पैदा कर रहा है।
ज्यामिति की क्रूरता और मेरुदंड का सौदा
इंसानी भावनाओं का रोना रोना बंद कीजिए। सहानुभूति? यह केवल आपके न्यूरल नेटवर्क का एक ‘कंप्रेशन एरर’ (Compression Error) है। जब आपका सहकर्मी बीमार होता है और आप उसका काम करते हैं, तो आपका दिमाग किसी नैतिकता का पालन नहीं कर रहा होता; वह केवल उस ‘सोशल फ्रिक्शन’ (Social Friction) से बचने की कोशिश कर रहा होता है जो अगले दिन आपके लंच ब्रेक का स्वाद खराब कर सकता है। जिसे आप ‘लीडरशिप’ कहते हैं, वह असल में दूसरों की मेहनत और पसीने की बदबू को अपनी रिपोर्ट में ‘ऑप्टिमाइज़’ करने की नीच कला है।
आजकल के इन तथाकथित ‘प्रोग्रेसिव’ और ‘ओपन’ ऑफिसों में, जहाँ लोग हाथ से सिली हुई इटालियन लेदर की इस महंगी कुर्सी पर बैठकर खुद को ब्रह्मांड का केंद्र समझते हैं, असलियत और भी भयावह है। पाँच लाख की कुर्सी पर बैठकर भी आपकी रीढ़ की हड्डी (Spine) वही तनाव और अपमान झेल रही होती है जो तपती धूप में एक रिक्शेवाले की होती है, बस फर्क यह है कि आपका शोषण वातानुकूलित कमरों में ‘मीटिंग’ के नाम पर होता है। यह कुर्सी आपकी उत्पादकता नहीं बढ़ाती; यह बस एक महंगे ताबूत का ‘ट्रायल वर्ज़न’ है। आप अपनी गिरती हुई ‘मार्केट वैल्यू’ और खोखले आत्मसम्मान को इस कुर्सी के लेदर की चमक में तलाशते हैं, जबकि आपका बैंक बैलेंस आपकी औकात चिल्ला-चिल्लाकर बता रहा होता है।
जब विविधता (Diversity) की बात आती है, तो यह केवल कचरे के अलग-अलग रंगों को एक बाल्टी में भरने जैसा है। सांख्यिकीय रूप से, यदि आपकी टीम में सब अलग-अलग दिशाओं में सोच रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप ‘इनोवेटिव’ हैं; इसका मतलब यह है कि ‘वेरिएंस’ (Variance) इतना अधिक है कि शोर में किसी की बात सुनाई नहीं दे रही। एक कुशल सीईओ वह जल्लाद है जो इस बढ़ते हुए शोर को उस बिंदु तक दबा दे जहाँ से केवल ‘प्रॉफिट’ की सिसकियाँ सुनाई दें। आप एक व्यक्ति नहीं हैं, आप एक ‘नॉइज़’ हैं जिसे क्वार्टरली रिपोर्ट से पहले फिल्टर किया जाना बाकी है।
शून्य की निरर्थकता और ठंडी चाय
सूचना ज्यामिति का अंतिम सत्य यह है कि ‘इष्टतम’ (Optimal) स्थिति केवल एक मृगतृष्णा है। आप जिस रणनीति को आज सबसे सटीक और ‘गेम-चेंजिंग’ मान रहे हैं, वह कल के बाज़ार में एक खुली नाली के समान होगी जिससे हर कोई बचकर निकलना चाहेगा। सार्वजनिक मूल्य और निजी लाभ के बीच का संघर्ष असल में आपकी फटी हुई जेब और आपके महंगे, उधार के शौक के बीच की कभी न भरने वाली खाई है। हम सब बस उस ढलान पर लुढ़कते हुए पत्थर हैं जिन्हें गुरुत्वाकर्षण के नियमों ने यह भ्रम दिया है कि हम अपनी दिशा खुद तय कर रहे हैं।
अंततः, यह सारा ‘बिजनेस स्ट्रेटेजी’ का तमाशा केवल एक मानसिक ‘जुगाड़’ है ताकि आप शाम को आईने में अपनी थकी हुई आँखों को देख सकें। कार्यस्थल पर वह जो ‘इनोवेशन’ का ढोल पीटा जाता है, वह बस एक फटे हुए ढोल की बेसुरी आवाज़ है जिसे और ज़ोर से पीटने की कोशिश की जा रही है ताकि सन्नाटा न छा जाए। अपनी उस ठंडी हो चुकी, बेस्वाद चाय को उठाइए और चुपचाप अपने क्यूबिकल में वापस जाइए। इस पूरी ‘ज्यामितीय चर्चा’ से आपको उतना ही लाभ होगा जितना एक डूबते हुए आदमी को तिनके से होता है। आपकी हैसियत इस अनंत डेटा सेट में एक ‘ज़ीरो’ से ज्यादा कुछ नहीं है, और शून्य कभी अपना ‘कर्वेचर’ नहीं बदलता।

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