व्यर्थ की ज्यामिति

देखो उस सफेद कॉलर वाले ‘मैनेजर’ को। वह पावरपॉइंट की स्लाइडों पर नाचते हुए ग्राफ और ‘सिनर्जी’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का शोर मचा रहा है, जैसे कोई भूखा कुत्ता खाली कटोरे को चाट रहा हो। ये लोग जिसे “श्रम उत्पादकता” कहते हैं, वह असल में कुछ और नहीं, बल्कि एक थके हुए इंजन से जबरदस्ती धुआं निकालने की कोशिश है। हम सुबह नौ बजे दफ्तर की उस घुटन भरी लिफ्ट में घुसते हैं, जहाँ पसीने और सस्ते डियोड्रेंट की एक मिली-जुली गंध हवा में लटकी होती है, यह सोचकर कि आज हम कुछ ‘मूल्य’ पैदा करेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि आप केवल अपनी जैविक ऊर्जा को एक निरर्थक कॉर्पोरेट शोर में बदल रहे होते हैं। यह वैसा ही है जैसे आप एक फटे हुए जेब में सिक्के भर रहे हों—आप जितना अधिक ‘उत्पादक’ होने का नाटक करते हैं, आपकी आत्मा उतनी ही तेजी से फर्श पर गिरकर बिखरती जाती है। यह किसी ‘नॉन-स्टिक तवे’ पर जलते हुए उस डोसे जैसा है जिसे आप खुरचकर निकालने की कोशिश कर रहे हैं, पर अंत में प्लेट में केवल कोयला और बदबू ही बचती है।

भौतिकी का नरक और पैसे की भूख

उत्पादकता का यह सारा नाटक एक सामाजिक मिथक है, जिसे उन लोगों ने गढ़ा है जो खुद कभी काम नहीं करते। हम सोचते हैं कि एक ‘एजाइल मीटिंग’ में बैठकर हम कोई महान निर्णय ले रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक निर्णय की वास्तविक भौतिक कीमत क्या होती है? यह केवल आपके न्यूरॉन्स का एक झुंड नहीं है जो आपस में कुछ विद्युत संकेत साझा कर रहा है, बल्कि यह उस बिजली के बिल और आपके दोपहर के खाने के उस भारीपन का हिस्सा है जो आपके पेट में पत्थर की तरह बैठा है। जिसे आप “रणनीतिक दिशा” कहते हैं, वह गली के किनारे खड़े उस भिखारी की बड़बड़ाहट से बेहतर नहीं है जो सोचता है कि उसके हाथ हिलाने से शहर का ट्रैफिक चल रहा है। असली ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ केवल वह समय है जब आप अपनी कंपनी के लैपटॉप पर नेटफ्लिक्स चलाकर अपनी बिजली बचाते हैं और कंपनी का समय चुराते हैं।

असल में, किसी भी संगठन की कार्यक्षमता उसकी ‘सूचना प्रसंस्करण’ की क्षमता पर नहीं, बल्कि उसकी ‘बर्बादी को सहने की क्षमता’ पर टिकी होती है। लोग भावुक होकर कहते हैं कि “टीम वर्क” से पहाड़ हिलाए जा सकते हैं। बकवास। यह केवल थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम है जो आपकी मेहनत को धीरे-धीरे खा रहा है। जितनी बड़ी टीम, उतनी ही अधिक एंट्रॉपी—यानी उतनी ही अधिक गपशप, उतनी ही अधिक राजनीति और उतना ही कम काम। लोग एक-दूसरे को ‘सीसी’ (CC) में रखकर ईमेल भेजते रहते हैं जैसे कोई फटा हुआ गुब्बारा हवा भरने की कोशिश कर रहा हो। इस प्रक्रिया में सबसे ज्यादा नुकसान उस व्यक्ति का होता है जो सच में काम करना चाहता है, क्योंकि वह केवल उस ‘सिस्टम’ का एक और डेटा पॉइंट बनकर रह जाता है, जिसे महीने के अंत में एक तुच्छ वेतन वृद्धि के लिए अपनी रीढ़ की हड्डी टेढ़ी करनी पड़ती है।

ज्यामिति का विखंडन और महँगी खामोशी

अब थोड़ा उस तथाकथित ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के तमाशे को देखते हैं, जो सुनने में तो बहुत बौद्धिक लगता है, लेकिन असल में यह केवल यह बताने का एक तरीका है कि आप कितने गहरे गड्ढे में हैं। मान लीजिए कि आपका संगठन एक ‘रीमानियन मैनिफोल्ड’ (Riemannian manifold) है—एक ऐसी उबड़-खाबड़ ज़मीन जहाँ हर ‘निर्णय’ एक फिसलती हुई गेंद की तरह है। ‘फिशर सूचना’ (Fisher Information) यहाँ वह पैमाना है जो हमें बताता है कि आपकी “रणनीति” में थोड़ा सा बदलाव करने पर आपके बैंक बैलेंस में कितना बड़ा छेद होगा। जब कोई सीईओ कहता है कि हम “संगठन का कायाकल्प” कर रहे हैं, तो वह केवल इस मैनिफोल्ड पर एक ‘जियोडेसिक’ (Geodesic) खोजने की कोशिश कर रहा होता है—यानी वह सबसे छोटा रास्ता जो उसे उसकी अगली बोनस चेक तक पहुँचा दे, भले ही रास्ते में बाकी कर्मचारी कुचल दिए जाएँ।

निर्णय लेना कोई कला नहीं है, यह शुद्ध ‘डिफरेंशियल ज्योमेट्री’ है, जो आपके खाली पेट और उस शानदार शोर-रहित हेडसेट के बीच का तनाव है। जिसे आपने केवल इसलिए खरीदा ताकि आप अपने बगल में बैठे उस सहकर्मी की आवाज़ न सुन सकें जो हर पाँच मिनट में अपनी शादी की समस्याओं के बारे में रोता रहता है। जिसे हम “अनुभव” कहते हैं, वह दरअसल हमारे मस्तिष्क में जमा हुआ ‘फिशर इंफॉर्मेशन’ का वह कचरा है जो हमें बताता है कि पिछली बार जब हमने कुछ नया करने की कोशिश की थी, तो हमें कितनी बुरी तरह डाँटा गया था। हम उसी पुराने रास्ते पर बार-बार चलते हैं क्योंकि हमारे न्यूरल पाथवे इतने घिस चुके हैं कि वे अब नए रास्तों की ज्यामिति को समझ ही नहीं पाते।

दफ्तर की राजनीति से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक, सब कुछ केवल ‘प्रोबेबिलिटी स्पेस’ में होने वाली एक हलचल है। हम जिसे “सफलता” कहते हैं, वह केवल एक सांख्यिकीय विसंगति (Statistical Anomaly) है, एक ऐसा संयोग जिसे हमने अपनी रात भर की जागने वाली मेहनत का नाम दे दिया है ताकि हम खुद को आईने में देख सकें। कल फिर वही सूरज उगेगा, फिर वही ‘डेडलाइन’ आएगी, और हम फिर से उसी रीमानियन सतह पर फिसलते हुए खुद को सांत्वना देंगे कि हम कहीं पहुँच रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हम बस उसी जगह खड़े होकर तेज़ी से भाग रहे हैं, जहाँ से हमने शुरू किया था—थके हुए, खाली और पूरी तरह से व्यर्थ। अब जाकर वह ठंडा समोसा खा लो, इससे ज्यादा की तुम्हारी औकात नहीं है।

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