यांत्रिक मोक्ष

गुलामी का सौंदर्यशास्त्र

लिंक्डइन और कॉर्पोरेट जगत के motivational सुविचारों को एक पल के लिए कचरे के डिब्बे में डाल दीजिए, जहाँ उनकी असली जगह है। आज हम उस सड़न की बात करेंगे जिसे आप ‘करियर’ कहते हैं। इंसान को एक गलतफहमी है कि ‘काम’ करने से उसे मोक्ष मिलता है, लेकिन सच तो यह है कि यह केवल एक जैविक मजबूरी है, जिसे सभ्यता का मुलम्मा चढ़ा दिया गया है। हन्ना आरेंट (Hannah Arendt) का ‘पशु लेबरन्स’ (Animal Laborans) का सिद्धांत कोई विश्वविद्यालय की चारदीवारी में कैद किताबी ज्ञान नहीं है; यह उस औसत क्लर्क की दयनीय हालत है जो सुबह की भीड़ भरी बस में अपनी बगल वाले की पसीने की बदबू झेलते हुए ऑफिस पहुँचता है, सिर्फ इसलिए ताकि वह अपने अस्तित्व को ‘प्रोडक्टिव’ साबित कर सके।

हम जिसे ‘उत्पादकता’ कहते हैं, वह असल में दिमाग की उस खुजली की तरह है जिसे आप जितना खुजलाते हैं, वह उतनी ही बढ़ती जाती है। एक ईमेल का जवाब देना या एक्सेल शीट में हरे रंग के सेल भरना कोई उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह उस मच्छर को मारने जैसा है जो रात भर आपकी नींद हराम करता है—एक अंतहीन, थकाऊ और निरर्थक प्रक्रिया। यह डोपामाइन का एक सस्ता नशा है। एआई (AI) इस सड़न को सोखने के लिए नहीं, बल्कि आपकी तथाकथित ‘उपयोगिता’ को इतिहास के कूड़ेदान में डालने के लिए आई है। आप जो ‘क्रिएटिव’ होने का ढोंग करते हैं, वह असल में एल्गोरिदम के लिए केवल कच्चा डेटा है। आप उस ढाबे के मालिक की तरह हैं जो कड़ाही में वही पुरानी बासी सब्जी चला रहा है और उम्मीद कर रहा है कि ग्राहक उसे ‘विरासत’ कहेंगे।

घर जाना चाहता हूँ, सर दर्द हो रहा है।

बासी जलेबी और एन्ट्रापी का शोर

वैज्ञानिक शब्दावली के पीछे छिपना बंद कीजिए। यह कोई ‘एन्ट्रापी’ या ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics) का उच्च स्तरीय खेल नहीं है, बल्कि यह उस सब्जी वाले की चालाकी है जो सड़े हुए टमाटरों को टोकरी के नीचे छिपा देता है। जिसे हम ‘श्रम’ कहते हैं, वह भौतिकी की दृष्टि से केवल ऊर्जा की अकुशल बर्बादी है। जैसे एक खराब सीलिंग फैन बिना हवा दिए केवल शोर मचाता है और बिजली फूँकता है, ठीक वैसा ही आपका कॉर्पोरेट अस्तित्व है। एआई केवल इस शोर को कम करने का एक गणितीय तरीका है। वह ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के सबसे छोटे रास्ते को चुनती है, जबकि इंसान हमेशा सबसे लंबे और सबसे उबाऊ रास्ते पर चलना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि पसीना बहाने में ही ‘चरित्र’ है।

विडंबना देखिए, आजकल के लोग अपनी रीढ़ की हड्डी के दर्द को कम करने के लिए लाखों खर्च कर देते हैं। वे सोचते हैं कि हर्मन मिलर की यह महंगी कुर्सी खरीद लेने से उनका दफ्तर का नर्क स्वर्ग बन जाएगा। यह एक बहुत ही महंगा भ्रम है। यह कुर्सी, जिसके दाम में एक छोटा शहर बस जाए, केवल एक ऊँचे दर्जे का स्टूल है जिस पर बैठकर आप अपनी बर्बादी का तमाशा और अधिक ‘आराम’ से देख सकते हैं। आप चाहे पाँच लाख की एर्गोनोमिक कुर्सी पर बैठें या सड़क किनारे किसी टूटे हुए बेंच पर, ब्रह्मांड के लिए आपकी कीमत केवल उतनी ही है जितना डेटा आप एक दिन में उगल सकते हैं। मशीनों को आपकी भावनाओं से या आपकी पीठ के दर्द से नहीं, बल्कि आपके ‘आउटपुट’ के उस सूखे हुए टुकड़े से मतलब है जिसे आप अपना ‘करियर’ कहते हैं।

बकवास है सब।

डिजिटल सर्कस और सार्वजनिक मौत

आरेंट ने जिस ‘सार्वजनिक क्षेत्र’ (Public Realm) का सपना देखा था, जहाँ मनुष्य ‘कार्य’ (Work) और ‘गतिविधि’ (Action) के माध्यम से अमरत्व प्राप्त करता है, वह आज एक गंदा नाला बन चुका है जहाँ हर कोई अपनी कुंठाएं फेंक रहा है। आज की ‘गतिविधि’ केवल स्मार्टफोन की स्क्रीन पर अंगूठे घिसना है। हम विचारों का आदान-प्रदान नहीं कर रहे, बल्कि हम उस भीड़ का हिस्सा हैं जो एक एक्सीडेंट होने पर मदद करने के बजाय वीडियो बनाती है ताकि उसे ‘लाइक्स’ मिल सकें। स्वचालन (Automation) हमें आजाद नहीं करेगा, बल्कि हमें उस अपाहिज की तरह बना देगा जिसे यह भी नहीं पता कि उसके पैर कब काट दिए गए।

जैसे-जैसे मशीनें हमारे ‘श्रम’ को निगलता जाएंगी, हमारा अस्तित्व उस पुरानी घड़ी की तरह हो जाएगा जो सेल खत्म होने के बाद भी केवल दीवार की शोभा बढ़ाती है। हमारे पास बात करने के लिए कुछ नहीं होगा क्योंकि हमारी भाषा को भी एल्गोरिदम ने चुरा लिया है। हम केवल एक-दूसरे की तरफ देखेंगे और पाएंगे कि हमारे अंदर केवल एक खोखलापन है, जो उस खाली तिजोरी की तरह है जिसकी चाबी हम बहुत पहले खो चुके हैं। यह ‘शुद्ध गतिविधि’ नहीं है, यह एक सार्वजनिक आत्महत्या है जिसे हम ‘प्रगति’ का नाम दे रहे हैं। यह सब देखकर मन करता है कि बस कहीं दूर चले जाएं, जहाँ कम से कम यह झूठी चमक न हो। क्या बकवास है।

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