लोकतंत्र, कॉर्पोरेट बोर्डरूम, या आपके पड़ोस की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन—इन सबमें एक चीज़ साझा है: ‘सार्वजनिक हित’ के नाम पर की जाने वाली अंतहीन और अर्थहीन बकवास। संगठन नामक इस मानसिक चिकित्सालय में, ‘सहमति निर्माण’ जैसा शब्द उस पुरानी चाय की तरह है जो पिछले तीन घंटों से मीटिंग रूम की मेज पर ठंडी हो रही है—बेस्वाद, ठंडी, और जिसके ऊपर अब मलाई की एक अजीब सी परत जम चुकी है। जिसे हम ‘सामाजिक अनुकूलन’ या ‘रणनीतिक संरेखण’ कहते हैं, वह वास्तव में सूचना के विशाल समुद्र में होने वाली एक सांख्यिकीय दुर्घटना मात्र है। हम यह भ्रम पाल लेते हैं कि हम किसी भव्य उद्देश्य की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि वास्तव में हम केवल यह गणना कर रहे होते हैं कि इस डूबते हुए जहाज से सबसे पहले責任 (जिम्मेदारी) की किस नाव पर सवार होकर भागा जाए।
भीड़ का सड़ांध और एन्ट्रापी
जब किसी संगठन में ‘लोकतांत्रिक’ निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू होती है, तो हम मान लेते हैं कि सभी की राय का योग हमें सत्य की ओर ले जाएगा। यह वैसा ही भ्रम है जैसा यह सोचना कि पुरानी सब्जी मंडी के कचरे के ढेर में अगर दस और सड़े हुए टमाटर डाल दिए जाएं, तो वह फलों का सलाद बन जाएगा। सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के दृष्टिकोण से, यह ‘सहमति’ नहीं है; यह एन्ट्रापी (Entropy) का चरम है। दस मूर्ख जब एक गोलमेज के चारों ओर बैठते हैं, तो वहां बुद्धिमत्ता का सृजन नहीं होता, बल्कि अज्ञानता का घातांक (Exponential) विस्तार होता है।
यह प्रक्रिया ठीक वैसी ही है जैसे दिल्ली की उमस भरी गर्मी में एक ट्रैफिक जाम में फंसे रहना, जहां एसी खराब हो चुका है और आप केवल अपने आगे वाली कार की नंबर प्लेट को घूर रहे हैं। उस कार से निकलने वाला काला धुआं और बगल वाले ड्राइवर का पसीना—यही वह ‘सामूहिक अनुभव’ है जिसे आप कॉर्पोरेट भाषा में ‘टीम स्पिरिट’ कहते हैं। सूचना के इस मैनिफोल्ड (Manifold) में, जिसे हम ‘सहानुभूति’ कहते हैं, वह वास्तव में केवल एक न्यूरोलॉजिकल बग है। यह एक त्रुटि है जो हमें डेटा को स्पष्ट रूप से देखने से रोकती है। हम एक-दूसरे को समझने की कोशिश नहीं कर रहे हैं; हम बस उस बिंदु की तलाश कर रहे हैं जहां हम अपनी अयोग्यता को ‘सर्वसम्मति’ के गलीचे के नीचे छिपा सकें।
विकृत ज्यामिति और महँगा कचरा
सूचना ज्यामिति के नजरिए से देखें तो सामाजिक अनुकूलन (Social Optimum) प्राप्त करना किसी पहाड़ की चोटी पर चढ़ने जैसा नहीं है, बल्कि एक वक्र सतह (Curved Surface) पर संतुलन बनाए रखने जैसा है। लेकिन इस सतह की वक्रता तर्क या तथ्यों से निर्धारित नहीं होती। यह निर्धारित होती है उस व्यक्ति की खांसने की आवाज से, जिसकी कुर्सी सबसे महंगी है। फिशर इंफॉर्मेशन मेट्रिक (Fisher Information Metric) यहां मायने नहीं रखता; मायने यह रखता है कि सत्ता का भारी लौह-गोलक इस रबर की चादर को कितना नीचे धंसा रहा है।
इस विद्रूप ज्यामितीय स्थान में, हम अपनी ‘विशिष्टता’ का प्रदर्शन करने के लिए बेतुके प्रयास करते हैं। जैसे कि यह Pelikan Souverän M800 फाउंटेन पेन। इसकी कीमत इतनी है कि इसमें एक छोटे परिवार का महीने भर का राशन आ जाए, लेकिन यह करता क्या है? क्या यह आपकी सोच की वक्रता को सीधा कर सकता है? कतई नहीं। यह केवल एक महँगा, चमकदार खिलौना है जिसे आप अपनी जेब में लगाकर घूमते हैं ताकि दुनिया को यह भ्रम हो सके कि आप महत्वपूर्ण हैं। जब आप इस पेन से, जिसकी निब सोने की है, कागज पर “जी सर, मैं सहमत हूँ” लिखते हैं, तो उस स्याही का वजन आपके आत्मसम्मान से अधिक होता है। यह एक विलासितापूर्ण गुलामी का प्रतीक है—एक ऐसा उपकरण जो सांख्यिकीय रूप से दस रुपये के बॉल पेन से बेहतर नहीं है, लेकिन सामाजिक मैनिफोल्ड पर आपके अहंकार को तुष्ट करने के लिए आवश्यक है।
शून्य का सन्नाटा
रीमानियन मैनिफोल्ड पर जब हम ‘पूर्ण सहमति’ या ‘सामाजिक अनुकूलन’ की बात करते हैं, तो हम वास्तव में ऊष्मीय मृत्यु (Heat Death) की बात कर रहे होते हैं। पूर्ण शांति का अर्थ है—शून्य जानकारी। यदि हर कोई एक ही बात मान लेता है, तो उस प्रणाली में जीवन नहीं बचता, केवल एक ठंडी, पथरीली खामोशी बचती है। जिसे आप ‘सफल मीटिंग’ कहते हैं, वह वास्तव में बौद्धिक गतिविधियों का पूर्ण विराम है।
इसलिए, यह सोचना बंद करें कि आप किसी महान बदलाव का हिस्सा हैं। आप बस एक विशाल, वक्र सूचना मैनिफोल्ड पर रेंगने वाला एक तुच्छ सांख्यिकीय बिंदु हैं, जो अपनी स्थानीय न्यूनतम स्थिति (Local Minima) को ‘सत्य’ समझने की भूल कर रहा है। दुनिया एक बहुत ही खराब तरीके से लिखा गया एल्गोरिदम है, और हम सब बस उसके क्रैश होने का इंतजार कर रहे हैं। अब अपने लैपटॉप बंद करो और घर जाओ। वहां टूटा हुआ गीजर और बिजली का बिल आपका इंतजार कर रहा है, जो किसी भी ज्यामितीय सिद्धांत से ज्यादा वास्तविक है।

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