दक्षता का पाखंड

पिछली बार जब हम उस दमघोंटू कॉन्फ्रेंस रूम में कैद थे, जहाँ ‘सिनर्जी’ और ‘होलिस्टिक ग्रोथ’ जैसे शब्दों की लाशें बिछाई जा रही थीं, तब मैंने तुम्हारी आँखों में वह शून्यता देखी थी। याद है वह कैंटीन की ठंडी चाय, जिसकी सतह पर तेल की एक अजीब, इंद्रधनुषी परत तैर रही थी? उसे पीते वक्त गले में जो कसैलापन महसूस हुआ था, वही असल में ‘श्रम उत्पादकता’ (Labor Productivity) का असली स्वाद है। जिसे तुम अपना ‘करियर’ कहते हो, वह उस गंदले, बासी द्रव से ज्यादा पवित्र नहीं है। कॉरपोरेट जगत ने तुम्हें यह रटा दिया है कि पसीना बहाना एक नैतिक धर्म है, जबकि गणितीय वास्तविकता यह है कि तुम्हारा पूरा अस्तित्व केवल एक सांख्यिकीय शोर (Statistical Noise) है जिसे बैलेंस शीट से मिटाने के लिए एचआर विभाग हर तिमाही में नए फॉर्मूले ईजाद करता है।

लोग समझते हैं कि नया हुनर सीखना (Skill Acquisition) किसी हिमालय की चोटी पर चढ़ने जैसा आध्यात्मिक अनुभव है। क्या मूर्खतापूर्ण रोमानियत है। यदि हम इसे सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के निष्ठुर लेंस से देखें, तो एक ‘कुशल’ कर्मचारी बनने की प्रक्रिया किसी सांख्यिकीय मैनिफोल्ड (Statistical Manifold) पर कीचड़ में लोटने से ज्यादा कुछ नहीं है। फिशर सूचना मीट्रिक (Fisher Information Metric) को तुम अपनी योग्यता का प्रमाण पत्र मानते हो? गलत। यह तो बस एक पैमाना है—बिलकुल वैसा ही जैसे कोई जेबकतरा किसी की जेब की मोटाई का अंदाज़ा लगाता है—कि तुम सिस्टम के लिए कितने ‘अनुमानित’ (predictable) हो। तुम जितना अधिक सीखते हो, तुम उतने ही एकमान (standardized) होते जाते हो।

कौशल अर्जित करना, असल में, एक सस्ते ढाबे पर कल की बची हुई, ठंडी और रबर जैसी हो चुकी रोटियों को निगलने जैसा है। तुम्हें भूख है (यानी नौकरी का डर), इसलिए तुम उसे चबाते हो, यह जानते हुए भी कि यह तुम्हारे पेट (यानी मौलिकता) को खराब कर देगी। जब तुम एक्सेल के नए शॉर्टकट या कोडिंग के नए सिंटैक्स रटते हो, तो तुम अपनी ‘आत्मा’ के कोलाहल को मारकर खुद को एक सुचारू प्रायिकता वितरण (Probability Distribution) में बदल रहे होते हो। यह प्रक्रिया उतनी ही हिंसक और अपमानजनक है जितनी विरार फास्ट लोकल ट्रेन में पीक आवर्स के दौरान चढ़ना। वहाँ, जहाँ पसीने से तरबतर किसी अजनबी की कोहनी तुम्हारी पसलियों में धंसती है और साँस लेने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है, वही ‘दक्षता’ की असली ज्यामिति है। तुम सोचते हो कि तुम गति कर रहे हो, लेकिन तुम सिर्फ एक सड़े हुए, भीड़भाड़ वाले सांख्यिकीय स्थान में अपनी जगह बनाए रखने के लिए धक्के खा रहे हो। और इस सारी जद्दोजहद, इस सारे घर्षण का परिणाम क्या है? महीने के अंत में तुम्हारे बैंक खाते में कुछ अंकों का जुड़ना, जो मुद्रास्फीति के दीमक द्वारा पहले ही खोखले किए जा चुके हैं।

और अब जरा उस ‘संगठनात्मक शिक्षण’ (Organizational Learning) के पाखंड को देखो, जिसका गुणगान करते तुम्हारे मैनेजर कभी नहीं थकते। गणित की भाषा में कहें तो, हर संगठन एक रीमानियन मैनिफोल्ड (Riemannian Manifold) है, लेकिन उसकी सतह समतल नहीं है। वह ऊबड़-खाबड़ और विकृत है। यह वक्रता (Curvature) कहाँ से आती है? यह तुम्हारे उन वरिष्ठ अधिकारियों के दिमाग की उपज है, जिनकी सोचने की क्षमता दशकों पहले ही लकवाग्रस्त हो चुकी है, बिल्कुल उनकी कुर्सियों पर जमी धूल की तरह। जब किसी संस्था की ज्यामितीय वक्रता ऋणात्मक (negative) हो जाती है, तो वहां ‘सूचना’ (Information) का प्रवाह असंभव हो जाता है। तुम चाहे कितना भी चिल्लाओ, तुम्हारा ‘इनोवेशन’ उस वक्रता के ब्लैक होल में खिंचकर शोर (Noise) में बदल जाएगा।

यही कारण है कि तुम खुद को दिलासा देने के लिए बाज़ारवाद के जाल में फंसते हो। तुम सोचते हो कि अगर तुम वह बेहद महंगा और बेतुका एचएचकेबी (HHKB) कीबोर्ड खरीद लोगे, जिसकी कीमत एक सामान्य भारतीय परिवार के दो महीने के राशन के बराबर है, तो अचानक तुम्हारी उत्पादकता आसमान छूने लगेगी। उस प्लास्टिक के टुकड़े की ‘ठक-ठक’ आवाज़ तुम्हें यह भ्रम देती है कि तुम कुछ महत्वपूर्ण कर रहे हो। लेकिन सच तो यह है कि तुम एक टूटे हुए छत के पंखे की तरह हो, जो शोर तो बहुत करता है, बिजली भी पूरी खाता है, लेकिन हवा रत्ती भर नहीं देता। तुम उस महंगे उपकरण पर अपनी उंगलियां नचाते हो, यह सोचकर कि तुम भविष्य लिख रहे हो, जबकि तुम केवल एन्ट्रापी (Entropy) बढ़ा रहे हो। एक टाइपराइटर के इस आधुनिक, महंगे अवतार पर पैसा फूंकना अपनी ही व्यर्थता को सोने के वर्क से ढकने की कोशिश है।

अंततः, जिसे तुम ‘प्रगति’ कहते हो, वह ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) के दूसरे नियम के खिलाफ लड़ी जा रही एक हारी हुई लड़ाई है। तुम एक जटिल उच्च-आयामी स्थान (High-dimensional space) में भटकते हुए डेटा बिंदु हो। जिस क्षण संगठनात्मक ज्यामिति में थोड़ा सा बदलाव आएगा—बाज़ार मंदी या कोई नया एआई टूल—तुम्हारी सारी ‘सीखी हुई कुशलता’ एक सिंगुलैरिटी (Singularity) में सिमट कर शून्य हो जाएगी। तुम्हारी मेहनत, तुम्हारी रातें काली करना, वह सब उस सांख्यिकीय गड्ढे में समा जाएगा। अब मुझे और मत बुलवाओ। मेरा सिर दुख रहा है। चलो बाहर चलते हैं, उस नुक्कड़ वाले से एक और समोसा खाते हैं—कम से कम वह कोलेस्ट्रॉल असली तो होगा, तुम्हारे इस कॉर्पोरेट जीवन की तरह नकली नहीं।

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