विश्वविद्यालय के ठीक पीछे, उस संकरी गली में जहाँ नाले की सड़ांध और उबलती हुई चाय की महक मिलकर एक अजीब सा नशा पैदा करती है, मैं अक्सर उस विशाल सरकारी इमारत को घूरता हूँ। बाहर से देखने पर यह ‘राष्ट्र निर्माण’ का केंद्र लगती है, लेकिन अगर आप इसकी त्वचा को छीलकर देखें, तो यह केवल सूचनाओं का एक कब्रिस्तान है। वहाँ काम करने वाले लोग, जो खुद को सिस्टम का पहिया समझते हैं, असल में उस जंग लगे तंत्र का हिस्सा हैं जो घूमने का नाटक तो करता है पर इंच भर भी आगे नहीं बढ़ता। हम जिसे ‘सार्वजनिक नीति’ (Public Policy) कहते हैं, वह हकीकत में सांख्यिकीय विकृति (Statistical Distortion) के अलावा और कुछ नहीं है। यह बाज़ार में मिलने वाले उस सस्ते चाइनीज़ पावर बैंक की तरह है, जिस पर क्षमता तो 20,000 mAh लिखी होती है, लेकिन जो आपके फोन को 10% चार्ज करने से पहले ही खुद दम तोड़ देता है। नीतियां केवल कागजों पर चमकदार होती हैं; सड़क पर उतरते ही वे दम तोड़ देती हैं।
तमाशा
संगठन के विकास को विद्वान लोग अक्सर ‘सूचना ज्यामिति’ (Information Geometry) के जटिल मॉडलों से समझाने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि समाज एक बहुआयामी (High-dimensional) धरातल है और नीतियां उस पर खींची गई लकीरें। बकवास। यह कोई उच्च गणित नहीं है, यह उस हलवाई की दुकान जैसा है जहाँ बासी मिठाइयों पर चाँदी का वर्क लगाकर उन्हें ताज़ा बताया जाता है। जब एक सरकारी बाबू ‘लोक कल्याण’ की बात करता है, तो वह किसी ऊँचे आदर्श की बात नहीं कर रहा होता; वह बस उस निम्न-ऊर्जा अवस्था (Low-energy state) को बनाए रखने की कोशिश कर रहा होता है जहाँ उसे कम से कम काम करना पड़े।
दफ्तरों के भीतर जिसे ‘टीम भावना’ कहा जाता है, वह तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) की दृष्टि से सहयोग नहीं, बल्कि सामूहिक षड्यंत्र है। यह डोपामाइन का एक सस्ता जुगाड़ है, जहाँ हर कोई एक-दूसरे की पीठ इसलिए थपथपाता है ताकि कोई उसकी पीठ में छुरा न घोंप दे। यह सिस्टम उस खटारा बस की तरह है जिसके टायरों में हवा नहीं, बल्कि मुसाफिरों की चीखें भरी हैं, और ड्राइवर इसे ‘अनुकूलित यात्रा’ (Optimized Journey) का नाम दे रहा है।
ज्यामिति
अगर हम इस ढहते हुए ढांचे को ‘रीमानियन मीट्रिक’ (Riemannian metric) के चश्मे से देखें, तो हमें एक भद्दा सच दिखाई देता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा साइंस के नाम पर जो तमाशा चल रहा है, वह ‘बुद्धिमत्ता’ नहीं है। यह कचरे के ढेर पर सबसे छोटा रास्ता (Geodesic) खोजने की एक नाकाम कोशिश है। मशीनें उसी सड़े हुए डेटा को प्रोसेस कर रही हैं जो इंसानी पूर्वाग्रहों और भ्रष्टाचार से सना हुआ है। परिणाम? एक ऐसी ‘स्मार्ट सिटी’ जहाँ सेंसर तो लगे हैं, लेकिन नालियाँ फिर भी जाम हैं।
विडंबना देखिए, नीतियों और वास्तविकता के बीच की यह दूरी (Kullback-Leibler divergence) लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसे पाटने की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं है। वह अधिकारी, जो वातानुकूलित केबिन में बैठकर ‘संरचनात्मक सुधार’ (Structural Reform) के आदेश टाइप करवा रहा है, वह खुद वास्तविकता से कोसों दूर है। उसकी रीढ़ की हड्डी को सहारा देने के लिए सरकार ने जो [लाखों रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सी](https://www.hermanmiller.com/en_in/products/seating/office-chairs/aeron-chairs/) खरीदी है, वह शायद इस पूरे विभाग में इकलौती ऐसी चीज़ है जो अपना काम ठीक से कर रही है। उस कुर्सी का मैश (mesh) उसके शरीर के भार को तो बखूबी संभाल लेता है, लेकिन उसके निर्णयों का भार यह देश नहीं संभाल पा रहा। यह भौतिक आराम और नैतिक पतन का एक उत्कृष्ट ज्यामितीय उदाहरण है।
शून्य
लोग डरते हैं कि एक दिन AI बागी हो जाएगा और दुनिया पर कब्ज़ा कर लेगा। मैं कहता हूँ, डरो मत। मशीनें हमें गुलाम नहीं बनाएंगी; वे बस हमारे झूठ को और अधिक कुशलता से, और अधिक गति से दोहराएंगी। जिसे हम ‘विविधता’ (Manifold) कहते हैं, वह विरोधाभासों का एक पुलिंदा है। हम मंगल ग्रह पर यान भेजने का जश्न मनाते हैं, जबकि उसी दिन एक खुला मैनहोल किसी की जान ले लेता है। यह सिस्टम का कोई ‘बग’ नहीं है, यह इसकी ‘फीचर’ है।
जब तंत्र में एन्ट्रापी (Entropy) अपनी चरम सीमा पर होती है, तो वह ‘स्थिरता’ का मुखौटा पहन लेती है। हमारी सार्वजनिक नीतियां अब समाधान नहीं हैं; वे उस फटे हुए गुब्बारे पर लगाया गया टेप हैं, जिसे हम यह सोचकर फुला रहे हैं कि इस बार यह नहीं फटेगा। दीवार पर चिपका ‘डिजिटल इंडिया’ का पोस्टर बारिश के पानी से गलकर नीचे गिर रहा है, और उसके पीछे की नंगी, बदरंग दीवार हमें मुँह चिढ़ा रही है। यही सत्य है।
मेरी चाय ठंडी हो चुकी है और कप में जमी मलाई अब किसी मृत त्वचा जैसी दिख रही है। अब यहाँ से उठने का समय है। इस ‘ज्यामितीय भ्रम’ को सुलझाने का ठेका मैंने नहीं ले रखा। भाड़ में जाए यह व्यवस्था और भाड़ में जाए तुम्हारी उम्मीदें।

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