कॉर्पोरेट एन्ट्रापी

व्यवस्था का सड़ांध भरा भ्रम

पिछले विमर्श में हमने डिजिटल दक्षता के उस नपुंसक विचार को नंगा किया था, जिसने मनुष्य को केवल एक ‘डेटा पॉइंट’ बनाकर छोड़ दिया है। लेकिन आज, चलिए उस भव्य प्रपंच की चीर-फाड़ करते हैं जिसे कॉर्पोरेट जगत बड़े गर्व से “संगठनात्मक विकास” या “ग्रोथ” कहता है। भौतिकी के चश्मे से देखें, तो जिसे आप एक ‘सुव्यवस्थित कंपनी’ कहते हैं, वह असल में एक ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) है—यानी एक ऐसी मशीन जो अस्तित्व में बने रहने के लिए पागलों की तरह ऊर्जा (पूंजी और मानव श्रम) गटकती है और बदले में केवल एन्ट्रापी, यानी अव्यवस्था और कचरा उगलती है।

आप जिसे ‘मैनेजमेंट’ कहते हैं, वह दरअसल थर्मोडायनामिक्स के दूसरे नियम के खिलाफ एक हारा हुआ युद्ध है। ब्रह्मांड का मौलिक स्वभाव व्यवस्था नहीं, बल्कि ‘बिखराव’ है। किसी बढ़ते हुए संगठन को अनुशासित रखने की कोशिश करना वैसा ही है, जैसे एक उफनते हुए गटर को नंगे हाथों से साफ करना—आप जितनी गंदगी हटाएंगे, पीछे से उससे दोगुनी बहकर आ जाएगी। यह संघर्ष पसीने, सस्ती कॉफी और वातानुकूलित हवा में मिली हुई हताशा की गंध पैदा करता है।

जब एक स्टार्टअप बड़ा होता है, तो वह एक ‘फेज ट्रांज़िशन’ (Phase Transition) से गुजरता है। यह पानी के भाप बनने जैसा स्वच्छ नहीं है; यह उस नुक्कड़ के ढाबे जैसा है जो अचानक एक ‘फ्रेंचाइजी’ बन जाता है। पहले जहाँ स्वाद और आत्मीयता थी, वहाँ अब केवल प्लास्टिक की मुस्कुराहट और बेस्वाद खाना है। ऊर्जा अब उत्पाद बनाने में नहीं, बल्कि उस विशालकाय नौकरशाही ढांचे के घर्षण को कम करने में खर्च होती है। आप मीटिंग्स करते हैं ताकि अगली मीटिंग की तारीख तय कर सकें। यह ‘काम’ नहीं है; यह एक मरणासन्न प्रणाली की आखिरी हिचकियाँ हैं।

बासी समोसे और ऊष्मागतिकी

इल्या प्रिगोगिन (Ilya Prigogine) ने सिद्धांत दिया था कि ‘अराजकता से व्यवस्था निकलती है’। सुनने में बहुत गहरा लगता है, लेकिन क्या उन्होंने कभी किसी मल्टीनेशनल कंपनी के ओपन-फ्लोर ऑफिस का मुआयना किया था? वहाँ व्यवस्था के नाम पर केवल डर का सन्नाटा होता है। सड़क किनारे खड़े समोसे वाले के पास देखिये—वहाँ कोई एचआर (HR) नहीं है, कोई ‘विजन स्टेटमेंट’ नहीं है, फिर भी वह भीड़ को नियंत्रित कर लेता है। वह एक ‘डायनेमिक इक्विलिब्रियम’ में है। इसके विपरीत, बोर्डरूम में बैठा हुआ एग्जीक्यूटिव उस डेढ़ लाख रुपये की एर्गोनोमिक कुर्सी पर अपनी रीढ़ टिकाकर यह सोचता है कि फर्नीचर बदलने से उसकी कंपनी की रीढ़ भी सीधी हो जाएगी। यह हास्यास्पद है। फोम और जालीदार कपड़े का वह महंगा ढांचा आपकी पीठ का दर्द तो शायद कम कर दे, लेकिन उस अस्तित्वगत खोखलेपन का क्या, जो आपकी बैलेंस शीट में दीमक की तरह लगा है?

संगठन के भीतर ‘टीम स्पिरिट’ और ‘लॉयल्टी’ जैसे शब्द उस बासी समोसे की तरह हैं जिसे बार-बार पुरानी तेल में तलकर परोसा जा रहा हो। खाने में क्रिस्पी, लेकिन पेट में जाकर सिर्फ तेजाब बनाते हैं। जिसे आप ‘कॉर्पोरेट कल्चर’ कहते हैं, वह वास्तव में अनिश्चितता के प्रति हमारे मस्तिष्क की रासायनिक प्रतिक्रिया है। हम एक-दूसरे का हाथ इसलिए नहीं पकड़े हैं क्योंकि हम एक दिशा में जाना चाहते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि हम अकेले डूबने से डरते हैं। हम सब एक बंद कमरे में अपनी शारीरिक ऊष्मा बढ़ा रहे हैं, यह उम्मीद करते हुए कि कोई एसी का तापमान कम कर देगा।

दीमक, जड़ें और शून्यता

यहाँ फ्रांसीसी दार्शनिक जाइल्स डेल्यूज़ (Gilles Deleuze) का ‘राइजोम’ (Rhizome) याद आता है। पुराने जमाने के संगठन ‘पेड़’ की तरह होते थे—जड़ से तना, तने से शाखा। लेकिन आज का बाजार एक ‘घास’ या ‘अदरक’ की तरह है, या कहूँ तो रसोई की दरारों में छिपे तिलचट्टों की तरह। इसकी कोई एक केंद्रीय जड़ नहीं है। इसे जहाँ से काटोगे, यह वहीं से दोगुना होकर फूटेगा। यह ‘राइजोमैटिक’ संरचना ही असली उत्तरजीविता है। यह सुंदर नहीं है; यह एक वायरल संक्रमण की तरह है जो बिना किसी केंद्रीय आदेश के फैलता है।

जो मैनेजर इसे ‘नियंत्रित’ करने के लिए फ्लोचार्ट बनाते हैं, वे मूर्खों के स्वर्ग में रहते हैं। आप अराजकता को पालतू नहीं बना सकते। जब कोई आपसे ‘सिनर्जी’ (Synergy) की बात करे, तो समझ जाइए कि उसके पास बेचने के लिए कुछ नहीं बचा है, सिवाय अपनी खुद की घबराहट के। हम ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में बदलते हुए, धीरे-धीरे खुद को राख में तब्दील कर रहे हैं। आपकी मेज पर पड़ी वह महंगी लेदर नोटबुक, जिसे आपने ‘ग्रेट आइडियाज’ नोट करने के लिए खरीदा था, आज भी कोरी है। उसके सफेद पन्ने आपकी दिनचर्या की शून्यता को मुँह चिढ़ाते हैं। आपने कागज नहीं, बल्कि अपने अपराधबोध को शांत करने के लिए एक महंगी रसीद खरीदी है।

अंततः, संगठन कोई ठोस ढांचा नहीं है। यह एक सामूहिक सम्मोहन है। एक ऐसा सपना जो तब तक चलता है जब तक हम अपनी जवानी और समय को इसमें ईंधन की तरह झोंकते रहते हैं। जिस दिन यह ईंधन खत्म हुआ, पूरा ढांचा ताश के पत्तों की तरह नहीं, बल्कि सड़े हुए मांस के ढेर की तरह ढह जाएगा।

コメント

タイトルとURLをコピーしました