देखो भाई, यह जो तुम सुबह-सुबह टाई की गांठ कसकर ‘सस्टेनेबिलिटी’ और ‘ग्रोथ’ की बीन बजाते हो, यह असल में एक भूखे पेट की मरोड़ से ज्यादा कुछ नहीं है। तुम्हारी यह चमचमाती कंपनी कोई ‘पवित्र मंदिर’ या ‘नवाचार का केंद्र’ नहीं है, बल्कि विशुद्ध रूप से एक नाली है जिसमें पैसा बहता है और अंत में कचरा बचता है। जब तक नाली साफ है, तुम उसे ‘विजन’ कहते हो, और जैसे ही कचरा फंसा, तुम उसे ‘क्राइसिस मैनेजमेंट’ का नाम दे देते हो। यह सब केवल ब्रह्मांड के उस क्रूर और अटल नियम का तमाशा है जिसे तुम ‘एंट्रॉपी’ कहते हो, लेकिन आम सड़क छाप भाषा में इसे ‘सड़न’ कहते हैं। तुम जिस व्यवस्था को बनाने में अपनी जवानी खपा रहे हो, वह दरअसल बिखरने के लिए ही बनी है।
प्रवाह: भूख और कचरे का खेल
भौतिकी की बड़ी-बड़ी बातें छोड़ो, नोबेल पुरस्कार विजेता इल्या प्रिगोलिन की ‘डिसीपेटिव स्ट्रक्चर्स’ की थ्योरी को अगर मैं देसी भाषा में समझाऊं, तो असलियत यह है कि तुम्हारा संगठन एक लालची, कभी न भरने वाले पेट की तरह है। एक कुत्ता भी तब तक वफादार है जब तक तुम उसे रोटी डाल रहे हो; उसी तरह तुम्हारी कंपनी को जीवित रहने के लिए बाहर से ‘नेगेटिव एंट्रॉपी’ नहीं, बल्कि ताज़ा शिकार चाहिए—चाहे वह ग्राहकों की जेब से निकला पैसा हो या फिर कर्मचारियों की चूसी हुई जवानी। तुम इसे ‘रिसोर्स एक्विजिशन’ जैसे भारी-भरकम शब्दों से ढकने की कोशिश करते हो, पर असल में यह एक परजीवी की भूख है। अगर कल बाजार से पैसा आना बंद हो जाए, तो तुम्हारी यह ‘महान संस्था’ किसी पुरानी, बंद पड़ी फैक्ट्री की बासी कढ़ी की तरह महकने लगेगी।
इस प्रवाह को बनाए रखने के लिए तुम जो सर्कस करते हो, वह किसी ट्रैफिक जाम में फंसे ऑटो वाले की गाली-गलौज जैसा निरर्थक है। तुम जितना शोर मचाओगे, उतनी ही ऊर्जा बर्बाद होगी। तुम सोचते हो कि तुम मीटिंग रूम में बैठकर ‘वैल्यू’ बना रहे हो? नहीं, तुम बस ब्रह्मांड की शांति में खलल डाल रहे हो। तुम्हारी हर बैलेंस शीट असल में उस ‘ऊष्मीय मृत्यु’ (Heat Death) की ओर एक और कदम है, जहाँ अंत में सब कुछ राख हो जाना है। तुम जितनी ज्यादा फाइलें हिलाते हो, तुम्हारे दिमाग और ऑफिस का माहौल उतना ही गर्म होता है, और उस गर्मी को बाहर फेंकने के लिए तुम जो सेंट्रल एयर कंडीशनर चलाते हो, वह बिजली बिल के रूप में तुम्हारी जेब से ‘एंट्रॉपी’ निकाल रहा है। यह एक ऐसी चूहा-दौड़ है जिसमें जीतना नामुमकिन है, क्योंकि थर्मोडायनामिक्स के नियम ही हारने के लिए बनाए गए हैं।
क्षय: सड़ा हुआ मांस और दिखावा
इंसानी जज्बात? वफादारी? टीम स्पिरिट? ये सब दिमाग के किसी कोने में लगी एक मामूली खुजली है, जिसे विकासवाद ने गलती से छोड़ दिया है। जब कोई एचआर मैनेजर कहता है कि “हम एक परिवार हैं,” तो समझ लेना कि वह तुम्हें हलाल करने की तैयारी कर रहा है। यह वफादारी केवल एक ‘केमिकल लोचा’ है, डोपामाइन का एक सस्ता नशा, जो तब तक रहता है जब तक बोनस की उम्मीद जिंदा है। जैसे ही अप्रेजल खराब हुआ, तुम्हारी ‘कॉर्पोरेट संस्कृति’ किसी मरे हुए चूहे की तरह फर्श के नीचे सड़ने लगती है।
लोग इस अंदरूनी सड़न और अपनी खुद की नश्वरता को छिपाने के लिए अजीब-अजीब हरकतें करते हैं। कोई गधा अपने केबिन में एक लग्जरी इटालियन लेदर ब्रीफकेस मेज पर सजाकर रखेगा, जैसे कि उस महंगे चमड़े की चमक उसके दिमाग के खालीपन और असुरक्षा को ढक लेगी। सच तो यह है कि उस महंगे डिब्बे के अंदर वही पुराने, उबाऊ और फटे हुए कागजात पड़े हैं जिनका कोई भविष्य नहीं है। यह बैग उस आदमी की असुरक्षा का एक महंगा इलाज है, जो यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसकी कंपनी का अंत तय है। वह उस बैग को ऐसे पकड़ता है जैसे वह कोई ‘लाइफ जैकेट’ हो जो उसे डूबने से बचा लेगी, जबकि वास्तव में वह केवल एक डूबता हुआ पत्थर है जिसे उसने खुद अपने गले में बांध रखा है। तुम्हारी महंगी गाड़ियाँ, पॉश दफ्तर और यह सब दिखावा केवल उस ‘हीट डेथ’ को भूलने की एक नाकाम और महंगी कोशिश है जो धीरे-धीरे तुम्हारी रगों में दौड़ रही है।
चयापचय: भ्रष्टाचार का लुब्रिकेंट
अगर तुम्हें लगता है कि सूचना (Information) का मतलब ‘डेटा’ या ‘एक्सेल शीट’ है, तो तुम सबसे बड़े मूर्ख हो। सूचना का असली मतलब वह ‘जुगाड़’ है जो इस सड़ते हुए सिस्टम को थोड़ा और खींच सके। दफ्तरों में होने वाली गपशप, राजनीति, ईर्ष्या और चमचागिरी—यह सब इस सिस्टम का असली ‘मेटाबॉलिज्म’ है। बिना इस घर्षण के तुम्हारी मशीन एक दिन भी नहीं चलेगी। जिसे तुम ‘एफिशिएंसी’ कहते हो, वह असल में भ्रष्टाचार और चापलूसी का वह तेल है जो जंग लगे हुए गियर्स को जबरदस्ती घूमने में मदद करता है। शुद्ध आदर्शवाद से तो एक चाय की दुकान भी नहीं चल सकती, मल्टीनेशनल कंपनी क्या खाक चलेगी।
एक सीईओ का असली काम विजन देना नहीं, बल्कि सिस्टम के अंदर जमा हो रहे कचरे (एंट्रॉपी) को किसी और के सिर पर फेंकना है। वे नई ‘पॉलिसी’ या ‘रिस्ट्रक्चरिंग’ का नाटक करते हैं ताकि पुरानी नाकामियों को ढका जा सके। यह वैसा ही है जैसे घर की गंदगी को साफ करने के बजाय उसे कालीन के नीचे दबा देना। कालीन के नीचे का वह ढेर एक दिन इतना बड़ा हो जाएगा कि तुम खुद उस पर फिसलकर गिरोगे और अपनी गर्दन तोड़ बैठोगे। ब्रह्मांड को तुम्हारी तरक्की, तुम्हारे शेयर प्राइस या तुम्हारे ‘लिंक्डइन’ पोस्ट से कोई मतलब नहीं है; वह बस इस ताक में बैठा है कि कब तुम्हारी यह छोटी सी कृत्रिम व्यवस्था टूटे और वह तुम्हारी सारी ऊर्जा को वापस छीनकर धूल में मिला दे। चाय ठंडी हो गई है और यहाँ की बदबू अब बर्दाश्त के बाहर है।

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