भाई, जरा इस गिलास को फिर से भर दो। आज की रात हम मुनाफे या तिमाही नतीजों पर नहीं, बल्कि उस गहरे और काले सच पर बात करेंगे जिसे तुम अपनी ‘लिंक्डइन प्रोफाइल’ के पीछे छिपाते फिरते हो। तुम जिसे ‘कॉर्पोरेट संरचना’ या ‘ऑर्गनाइजेशन’ कहते हो, वो असल में थर्मोडायनामिक्स (Thermodynamics) के दूसरे नियम के खिलाफ लड़ी जा रही एक हताश और पहले से हारी हुई लड़ाई है। विश्वविद्यालय में मैं अपने छात्रों को अक्सर बताता हूँ, और अब तुम्हें भी बता रहा हूँ—तुम्हारा यह ‘बिजनेस’ कुछ और नहीं, बस ब्रह्मांड में अव्यवस्था (Entropy) फैलाने की एक बहुत महंगी मशीन है।
ज़रा अपने ऑफिस की उस ‘सिनर्जी’ और ‘टीम वर्क’ को विज्ञान की नज़र से देखो। तुम जिसे ‘सहयोग’ कहते हो, वो भौतिकी की भाषा में अणुओं (molecules) की बेमतलब टक्कर है। जब दस लोग एक कॉन्फ्रेंस रूम में बैठकर चिल्लाते हैं, तो कोई ‘वैल्यू’ पैदा नहीं होती, सिर्फ घर्षण (friction) और गर्मी पैदा होती है। इंसान की भावनाएं, वो ‘मंडे मोटिवेशन’ और ‘एम्प्लॉई एंगेजमेंट’, ये सब सिस्टम के ‘बग्स’ (bugs) हैं। तुम्हारा दिमाग डोपामाइन के नशे में तुम्हें यह झूठ समझाता है कि तुम कुछ सार्थक कर रहे हो, जबकि तुम असल में केवल ऊर्जा को कचरे में बदल रहे हो।
इलिया प्रिगोगिन ने इसे ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ (Dissipative Structures) कहा था। एक कंपनी ठीक वैसी ही है जैसे सड़क किनारे खड़ा वो पुराना जेनरेटर, जो धुआँ ज्यादा देता है और बिजली कम। तुम बाहर से संसाधन—इंसानों की जवानी, कच्चा माल, बिजली—खींचते हो और उसे जलाकर ‘काम’ का नाटक करते हो। जिसे तुम ‘ग्रोथ’ कहते हो, वो उस जेनरेटर के इंजन का गरम होकर लाल हो जाना है। यह तरक्की नहीं है, यह विस्फोट से पहले की सूजन है। जैसे तुम्हारे स्मार्टफोन की बैटरी—जितना ज्यादा तुम उसे ‘फास्ट चार्ज’ (Growth Hacking) करने की कोशिश करते हो, वो उतनी ही जल्दी फूलकर फटने के कगार पर आ जाती है।
और इस सड़ते हुए सिस्टम को छिपाने के लिए तुम क्या करते हो? तुम खुद को महंगे खिलौनों से घेर लेते हो। अपने उस मैनेजर को देखो जो खुद को विजनरी समझता है। वो जिस हर्मन मिलर एयरोन कुर्सी (Herman Miller Aeron Chair) पर अपनी रीढ़ की हड्डी को टिकाए बैठा है, तुम्हें क्या लगता है, वो उसकी सोचने की क्षमता बढ़ा रही है? नहीं, मेरे दोस्त। दो लाख रुपये की वो जालीदार कुर्सी सिर्फ इसलिए है ताकि उसके दिमाग की सड़न उसके शरीर को महसूस न हो। वो एर्गोनॉमिक्स का सहारा लेकर एन्ट्रापी को धोखा देने की कोशिश कर रहा है। लेकिन भौतिकी को रिश्वत नहीं दी जा सकती। उस आरामदायक कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भी अंततः एक जैविक मशीन है जो धीरे-धीरे खराब हो रही है।
फिर आती है तुम्हारी ‘पब्लिक वैल्यू’ और ‘CSR’ की नौटंकी। तुम सोचते हो कि स्कूल में चंदा देकर या पेड़ लगाकर तुम समाज का भला कर रहे हो? बकवास। यह तो ‘स्टेडी स्टेट’ (Steady State) बनाए रखने का टैक्स है। यह वो हफ्ता-वसूली है जो तुम प्रकृति और समाज को देते हो ताकि वो तुम्हारी कांच की इमारत पर पत्थर न मारें। यह नैतिकता नहीं, यह ‘सिस्टम मेंटेनेंस’ है। जब तुम्हारा सीईओ उस काले रंग के मोंटब्लैंक (Montblanc) पेन से—जिसकी कीमत में एक गरीब का घर चल जाए—किसी चैरिटी के चेक पर साइन करता है, तो वो दान नहीं कर रहा होता। वो बस अपनी अंतरात्मा की आवाज और सिस्टम की अस्थिरता को उस महंगी स्याही के नीचे दबा रहा होता है। यह सब एक तमाशा है, एक भ्रम कि हम ‘संतुलन’ में हैं।
हकीकत तो यह है कि तुम, मैं, और यह पूरी अर्थव्यवस्था, हम सब एक बासी समोसे की तरह हैं जिसे बार-बार तलकर ताज़ा दिखने की कोशिश की जा रही है। तेल पुराना हो चुका है, आलू सड़ चुका है, लेकिन ‘मार्केटिंग’ की चटनी लगाकर उसे बेचा जा रहा है। तुम जिसे ‘इनोवेशन’ कहते हो, वो सूचना ज्यामिति (Information Geometry) के नजरिए से सिर्फ शोर (Noise) है। हम डेटा का पुनर्गठन कर रहे हैं, नया कुछ नहीं बना रहे।
बहुत हुआ। यह सब सोचकर थकान होती है। हम एक ऐसी बस में सवार हैं जिसके ब्रेक फेल हो चुके हैं और तुम लोग खिड़कियों के पर्दे बदलने पर बहस कर रहे हो। मुझे अब घर जाना है। यहाँ की वातानुकूलित हवा में भी अब मौत और झूठ की महक आने लगी है। बिल चुका देना।

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