कचरे का प्रबंधन
पिछली बार जब हम उस सड़क किनारे के ढाबे पर, जहाँ की चाय में चायपत्ती से ज्यादा धूल थी, ‘श्रम की निरर्थकता’ पर माथापच्ची कर रहे थे, तो शायद तुम्हें लगा होगा कि मैं बस अपनी भड़ास निकाल रहा हूँ। लेकिन वह भड़ास ही इस पूरी ‘सभ्यता’ का असली सच है। हम जिसे ‘सार्वजनिक ढांचा’ या ‘समाज’ कहते हैं, वह कोई पवित्र मंदिर नहीं है; वह बस एक खुली हुई नाली (Open Sewer) है, जिसे हम लगातार साफ रखने का नाटक करते हैं ताकि उसकी बदबू से हमारा दम न घुट जाए। यह ब्रह्मांडीय उधारी का खेल है—हम बाहर से ऊर्जा, पैसा और संसाधन चूसते हैं ताकि अपनी आंतरिक गंदगी, जिसे वैज्ञानिक ‘एन्ट्रॉपी’ कहते हैं, उसे बाहर फेंक सकें।
जब तुम सुबह की खचाखच भरी बस में, किसी अजनबी की बगल में दबे हुए, उसके पसीने की गंध सूंघते हो, तो वह ‘लोकतंत्र’ का सुगंध नहीं है। वह इस सिस्टम की ‘वेस्ट हीट’ (Waste Heat) है। हम सब एक विशालकाय ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर’ (Dissipative Structure) के ईंधन हैं, जो सिर्फ इसलिए चल रहा है क्योंकि हम इसमें अपनी जवानी और सुकून झोंक रहे हैं। जिसे तुम ‘परोपकार’ या ‘सामूहिकता’ कहते हो, वह तो बस हमारे दिमाग के सर्किट में होने वाला एक शॉर्ट-सर्किट है—एक सस्ता नशा, ताकि हम एक-दूसरे को नोच खाने के बजाय, कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करें। यह पूरी व्यवस्था उस फटे हुए टायर जैसी है जिसे ‘जुगाड़’ और थूक लगाकर चिपकाया गया है, और हम इसे ‘इंजीनियरिंग’ कहकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं।
महंगी बैसाखियां
इस सड़न को रोकने की कोशिश में हम अपनी हड्डियों का सुरमा बना लेते हैं। सच कहूँ तो, इस गिरती हुई व्यवस्था को कंधा देते-देते मेरी अपनी रीढ़ की हड्डी जवाब दे चुकी है। यह एक क्रूर मजाक है कि हम उस दर्द को कम करने के लिए उसी सिस्टम से महंगे समाधान खरीदते हैं जिसने हमें यह दर्द दिया है। कल ही, कमर के इस असहनीय दर्द से तंग आकर, मैंने अपनी दो महीने की कमाई एक बेहद महंगी एर्गोनोमिक कुर्सी पर फूंक दी।
साठ हजार रुपये। सिर्फ इसलिए ताकि मैं सीधा बैठ सकूँ और इस ब्रह्मांडीय तबाही का गवाह बन सकूँ। क्या यह [कुर्सी](https://example.com) मेरे जीवन की एन्ट्रॉपी को कम कर देगी? नहीं। यह बस मुझे यह भ्रम बेचने का एक जरिया है कि मैं ‘नियंत्रण’ में हूँ, जबकि असल में मैं बस एक और उपभोक्ता हूँ जिसे लुटने में सुकून मिलता है। हम विलासिता को ‘आराम’ समझते हैं, जबकि वह सिर्फ एक दर्द निवारक गोली है जो सभ्यता के कैंसर को कुछ पल के लिए भुला देती है।
कसाईखाना
अब इस तमाशे में जैक्स डेरिडा के उस ‘आने वाले’ (L’avenir) को डाल दो। लेकिन भूल जाओ उन दार्शनिक लफ्फाजियों को। वह ‘आने वाला’ कोई मसीहा नहीं है; वह उस ढीट मकान मालिक या बेरहम वसूली एजेंट जैसा है जो तुम्हारे दरवाजे पर तब दस्तक देता है जब तुम्हारी जेब खाली हो। वह अनियंत्रित है, गंदा है, और तुम्हारे सजाए हुए ड्राइंग रूम के कालीन पर कीचड़ वाले जूते लेकर आता है। और हमारा जवाब क्या है?
हम उन ‘सोच को बधिया करने वाली मशीनों’ (Thought-Neutering Machines) का सहारा लेते हैं। जिसे तुम नई तकनीक कहते हो, वह असल में एक डिजिटल कसाईखाना है। यह उस ‘आने वाले’ की अनिश्चितता को, उसके शोर को, और उसकी गंदगी को छानकर बाहर फेंकने का काम करती है। ये गणना करने वाले यंत्र हमें इंसान नहीं, बल्कि डेटा के टुकड़ों के रूप में देखते हैं। वे हमारी चेतना को पीसते हैं, हमारी आदतों को एल्गोरिथमिक छलनी से छानते हैं, और अंत में हमें एक ऐसे ‘पैटर्न’ में बदल देते हैं जो सुरक्षित हो, पूर्वानुमानित हो, और बाजार में बेचने लायक हो।
हम सोचते हैं कि ये मशीनें हमारी सेवा कर रही हैं, लेकिन असल में वे हमें पालतू जानवरों की तरह बाड़े में बंद कर रही हैं। वे हर उस चीज़ को ‘एरर’ मानकर मिटा देती हैं जो उनकी गणितीय जेल में फिट नहीं होती। हम सुरक्षा के नाम पर अपनी आत्मा का सौदा कर रहे हैं, एक ऐसी ‘स्थिरता’ (Stability) की भीख मांग रहे हैं जो मौत से भी बदतर है। यह शांति नहीं है; यह शमशान की खामोशी है। हम बस एक ठंडी, बेजान गणना का हिस्सा बनकर रह गए हैं, जहाँ धड़कन की आवाज़ को ‘शोर’ समझकर म्यूट कर दिया जाता है।
बाकी सब राख है।

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