मलबा, मलाई और एन्ट्रापी का सिद्धांत
सुनो, मेरे गिलास में और बर्फ मत डालो, वैसे भी इस दुनिया की ऊष्मा—जिसे हम ‘हीट डेथ’ कहते हैं—इतनी बढ़ चुकी है कि तुम्हारा यह सस्ता रेफ्रिजरेशन उसे बचा नहीं पाएगा। आज सुबह मैंने अखबार में पढ़ा कि एक और स्टार्टअप ने ‘पिवट’ (Pivot) किया है। वाह! क्या शब्द चुना है। ‘पिवट’। सुनने में ऐसा लगता है जैसे कोई बैले डांसर अपनी एड़ी पर खूबसूरती से घूम रहा हो, लेकिन असलियत में? असलियत में यह एक शराबी के नाले में गिरने जैसा है, जिसे उसने गिरते वक्त ‘जमीन का निरीक्षण’ घोषित कर दिया हो। कॉर्पोरेट जगत जिसे ‘पुनर्गठन’ या ‘रीस्ट्रक्चरिंग’ कहता है, वह ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) की भाषा में केवल एक ही चीज है: एक सड़ती हुई प्रणाली का अपनी आसन्न मृत्यु को टालने का भद्दा प्रयास।
डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स और गली का कचरा
तुम्हें इल्या प्रिगोगिन (Ilya Prigogine) का नाम पता है? नहीं पता होगा, तुम तो बस यही जानते हो कि समोसे में आलू कैसे भरना है। प्रिगोगिन ने हमें ‘डिसिपेटिव स्ट्रक्चर्स’ (अपव्ययी संरचनाओं) के बारे में बताया था। कोई भी कंपनी, या यह ढाबा जहाँ हम बैठे हैं, एक ‘ओपन सिस्टम’ है। यह जीवित रहने के लिए ऊर्जा पीता है और गंदगी बाहर थूकता है। एक संगठन तब तक ही सांस लेता है जब तक वह अपने अंदर की एन्ट्रापी (अव्यवस्था) को बाहर के वातावरण में फेंकने में सक्षम है।
लेकिन आज के सीईओ इसे नहीं समझते। वे सोचते हैं कि वे भगवान हैं। वे एन्ट्रापी को ‘मीटिंग्स’ और ‘टाउनहॉल’ में बदल देते हैं। क्या मूर्खता है! जब एक प्रणाली में कचरा जमा होने लगता है—जैसे तुम्हारे सिंक की पाइप में जमी वह काली, चिपचिपी काई—तो प्रवाह रुक जाता है। उस काई को तुम ‘मिडल मैनेजमेंट’ कह सकते हो। वे न तो ऊर्जा पैदा करते हैं और न ही उसे प्रवाहित होने देते हैं; वे बस एन्ट्रापी के संरक्षक बन जाते हैं। और जब यह गंदगी हद से ज्यादा बढ़ जाती है, तो सिस्टम ‘इक्विलिब्रियम’ यानी संतुलन की मांग करता है। और व्यापार में संतुलन का मतलब है—दिवालियापन। सन्नाटा। शून्य।
रीढ़ की हड्डी और झूठा सुकून
और इस सड़न के बीच, इंसान क्या करता है? वह समाधान नहीं खोजता, वह आराम खोजता है। मैंने देखा है उन तथाकथित ‘विजनरी’ नेताओं को। जब उनकी कंपनी की नींव में दीमक लग चुकी होती है और बैलेंस शीट से खून रिस रहा होता है, तब उनकी सबसे बड़ी चिंता क्या होती है? उनका आसन। जी हाँ, वे लाखों रुपये खर्च करके [एर्गोनोमिक कुर्सियां](https://www.hermanmiller.com/ja_jp/products/seating/office-chairs/aeron-chairs/) खरीदते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उनके नितंबों को सही ‘लम्बर सपोर्ट’ मिलेगा, तो शायद बाजार की गिरावट का झटका कम महसूस होगा।
यह वही मानसिकता है—टाइटेनिक डूब रहा है और कप्तान अपने केबिन में मखमल के पर्दे बदलवा रहा है। 2 लाख रुपये की कुर्सी पर बैठकर वे जूम कॉल पर चिल्लाते हैं, “हमें और अधिक चुस्त (Agile) होना होगा!” अरे बेवकूफों, जिस मलबे के ढेर पर तुम बैठे हो, वहां चुस्ती नहीं, केवल ‘घर्षण’ (Friction) है। वह एर्गोनोमिक जालीदार पीठ तुम्हें पसीने से तो बचा लेगी, लेकिन उस ठंडी आग से नहीं जो तुम्हारे बिजनेस मॉडल को नीचे से जला रही है। यह शुद्ध रूप से ‘वैनिटी मेट्रिक्स’ है—दिखावे का एक महंगा खिलौना जिसे तुम अपनी असुरक्षा के घाव पर बैंड-एड की तरह चिपकाते हो।
एआई: कचरा फैलाने की मशीनगन
अब इस तमाशे में ‘एआई’ (AI) को भी जोड़ लो। लोग इसे मसीहा मान रहे हैं। “एआई हमारी उत्पादकता बढ़ा देगा।” अरे भाई, थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम भूल गए? तुम ऊर्जा पैदा नहीं कर सकते, तुम बस उसका रूप बदल सकते हो। एआई किसी समस्या का समाधान नहीं है; यह तो बस एक ‘एन्ट्रापी मल्टीप्लायर’ है। पहले, एक बेवकूफ कर्मचारी दिन भर में दस गलतियां करता था। अब, एआई की मदद से, वही बेवकूफ एक सेकंड में दस हजार गलतियां कर सकता है, वह भी व्याकरण की शुद्धता के साथ।
यह जिसे तुम ‘डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन’ कहते हो, यह असल में एक सूचनात्मक बाढ़ है। तुम अपने सिस्टम में इतना डेटा ठूंस रहे हो कि अब कोई भी निर्णय ‘तर्क’ (Logic) पर आधारित नहीं है, सब कुछ ‘पैटर्न मैचिंग’ का जुआ है। यह एक ‘फेज ट्रांजिशन’ (चरण संक्रमण) है। जैसे पानी उबलकर भाप बनता है, वैसे ही तुम्हारा ठोस बिजनेस अब वाष्पशील (Volatile) हो चुका है। भाप में ऊर्जा बहुत होती है, लेकिन उसे नियंत्रित करना उस प्रेशर कुकर के बस की बात नहीं जिसका वाल्व तुमने ‘कॉस्ट कटिंग’ के नाम पर बेच दिया है।
संगठन अब इंसान नहीं चला रहे, एल्गोरिदम चला रहे हैं जो खुद नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। हम बस उस मशीन के पुर्जे हैं जो तेजी से गर्म हो रही है। और तुम जानते हो जब मशीन ज्यादा गर्म होती है तो क्या होता है? वह पिघलती है। हम सब पिघलने के कगार पर खड़े हैं, और तुम मुझसे पूछ रहे हो कि क्या एआई मेरी नौकरी खा जाएगा? अरे, एआई तो उस बैक्टीरिया की तरह है जो लाश को सड़ाने की प्रक्रिया तेज कर देता है।
विस्फोट का इंतज़ार
अंत में, यह सब गणित है। जब किसी बंद सिस्टम में आंतरिक दबाव, बाहरी दबाव से अधिक हो जाता है, तो विस्फोट अनिवार्य है। इसे तुम ‘मार्केट करेक्शन’ कह लो या ‘कुदरत का इंसाफ’। जो पिज्जा तुमने अभी मुझे दिया है, वह ठंडा है और तुम्हारी चाय में चीनी ज्यादा है। यह भी एन्ट्रापी का ही सबूत है। व्यवस्था बिखर रही है। जाओ, जाकर अपना काम करो, इससे पहले कि यह पूरा ढांचा तुम्हारे सिर पर गिर जाए।

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